कांकेर – यूपी लीडर एग्रीकल्चर ने नील-हरित शैलान के संबंध में जिले के किसानों को तकनीकी सलाह जारी की है। उन्होंने बताया कि असल में यह वैज्ञानिक नहीं बल्कि सायनोबैक्टीरिया नामक सूक्ष्म, प्रकाश संश्लेषक जीवाणुओं का एक समूह है, जो समुद्री पानी और नाम मिट्टी में पाए जाते हैं। ये स्टीकर्स स्थिर कर मिट्टी की उर्वरता की दुकानें और धान की फसल के लिए एक बेहतरीन, गुणवत्तापूर्ण जैविक खाद के रूप में काम करते हैं। नील हरित का सामान्य रूप से धान की फसल करीब 25-30 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर नाइट्रोजन का उत्पादन होता है। धान के खेत की फसल में नील हरित काई की 10 कि.ग्रा. मात्रा प्रति पोटैटो मौजूद है।
नील-हरिता साना जैव-उर्वरक के लाभः-
यह धान के टोकन में मुक्त जीवी के रूप में स्थिरीकरण करता है, जिससे 55-65 कि.ग्रा. तक की बचत की जा सकती है। यह रसायनिक पदार्थ जैसे-सोमलाईट से भरा हुआ है, जो मिट्टी की उर्वरता और विक्रय औषधियों को प्राप्त करता है। यह पूरी तरह से प्राकृतिक और पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं पहुंचाता है। यह मिट्टी की मिट्टी की स्थिति में सुधार के लिए शीशे के शीशे के प्रारंभिक अंकन में मदद करता है।
नील-हरित सोया की प्रयोग विधिः– धान की बीमारी के 7-10 दिन बाद, 10 कि.ग्रा. प्रति हेक्टेयर के दर से खेत में सामान रूप से चुराएं। प्रयोग समय खेत में 5-10 से.मी. पानी भरा होना चाहिए। किसानों को बताया गया कि इसका उपयोग केवल धान के लिए करें, किसी अन्य बीज के लिए नहीं। यह जैव रासायनिक उर्वरक खेती के लिए एक सस्ता और प्रभावी विकल्प है।
