
संभाग हेड
मोहम्मद इकरार अहमद।
अंबिकापुर/ कोरिया – देश के दूसरे सबसे बड़े राष्टीय गुरु घासीदास राष्ट्रीय उद्यान में एक के बाद एक नया कारनामा करने का मामला प्रकाश में आ रहा है ,जहां शासकीय कार्यों में घोर अमानवीय कृत्य करने वाले परिक्षेत्र अधिकारी सक्रिय हैं। जो हर रोज भ्रष्टाचार को उजागर कर शासन को लाखों का चूना लगाने से बाज़ नहीं आ रहे हैं, और मोटी गाढ़ी कमाई करते हुए अपने निजी हित में भ्रष्टाचारी पर शासकीय रकम जुटाने को आमदा है। जिसका चर्चा का बाजार गर्म हो रहा है।
वहीं दूसरी तरफ शासकीय कार्य के भ्रष्टाचार में संलिप्त परिक्षेत्र अधिकारी के कारनामे से परेशान होकर हर कोई परेशानियों का हल ढूंढ रहे हैं। जहां कोरिया जिले में स्थित गुरू घासीदास राष्ट्रीय उद्यान विभाग बैकुंठपुर के कमर्जी वन परिक्षेत्र का एक और नया कारनामा सामने आया हैं जहा सरकारी राशि के लाखों रुपए की लागत से बन रहे स्टॉपडेम में वन संपदा का उपयोग कर क्रेशर बिल लगाकर राशि निकालने की बात कहीं जा रही है। जिससे कही न कहीं वन संपदा का उपयोग कर शासकीय राशि से जमकर भ्रष्टाचार किया जा रहा है। वही स्टॉप डेम में जंगल के पत्थरो का अवैध रूप से निर्माण कार्य में उपयोग किया गया, स्टॉप डेम के निर्माण में जंगल के पत्थरो का पूर्ण रूप से उपयोग कर पर्यावरण को जमकर क्षति पहुंचाई गई है, जिससे स्टॉप डेम की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठना लाजमी हैं। जब कि राष्ट्रीय उद्यान अंतर्गत पूर्व में रामगढ़ में इसी तकनीक से बनाये गए स्टॉप डेम में दरार आने से टूट भी चुका है फिर भी जिम्मेदार अधिकारी कागजो में क्रेशर बिल लगाकर वन संपदा के उपयोग से अपना मोह नही छोड़ रहे।
मिली जानकारी अनुसार गुरु घासीदास राष्ट्रीय उद्यान के कमर्जी वन परिक्षेत्र के ग्राम छतोड़ा में वन विभाग के प्रभारी डिप्टी रेंजर के देखरेख में करीब 15 लाख रुपये की लागत से स्टॉप डेम का निर्माण करवाया जा रहा है शासन के नियमो को दरकिनार कर वन विभाग के अधिकारियों द्वारा निर्माण कार्य मे जमकर भ्रष्टाचार किया जा रहा है, वही शासकीय रिकार्ड में क्रेशर बिल लगाकर शासन को भी गुमराह किया जा रहा जब विभाग द्वारा खनिज व राजस्व विभाग को बिना रॉयल्टी भरे अवैध तरीको से चट्टानों को काटकर स्टॉप डेम में लगाया गया है। लाखों की लागत से कमर्जी वन परिछेत्र के अधिकारी द्वारा ग्राम छतोड़ा के जंगलों के नालों में स्टाप डैम निर्माण किया जा रहा है। निर्माण कार्य में गुणवत्ता का अभाव नजर आ रहा है। एक ओर शासन द्वारा विकास की गंगा बहाने के लिए कई योजना के माध्यम से ग्रामीणों व पशु पक्षियों की जीवन रक्षा के लिए करोड़ों की राशि स्वीकृत कर निर्माण कार्य कराया जाता है। दूसरी ओर निर्माण कार्य में गुणवत्ता का अभाव कई सवाल खड़े करता है। स्टाप डैम के निर्माण में एस्टीमेट के आधार पर पूर्ण कांक्रीटीकारण किया जाना है, लेकिन जंगल का भरपूर फायदा उठाकर पहाड़ी पत्थर से निर्माण करवा रहे हैं, अक्सर जंगल का नाम सुनकर लोग डरते हैं और इसे देखने वाला कोई नहीं हैं। इस संबंध में संबंधित प्रभारी रेंजर से पूछे जाने पर उन्होंने बताया कि हमारे हाथों में कुछ नहीं है। सब उच्च अधिकारियों के निर्देशानुसार कार्य कराया जा रहा है।

स्थानीय ग्रामीणों से मिली जानकारी अनुसार वन विभाग के प्रभारी अधिकारी द्वारा अपने देखरेख में कार्य करवाया गया है। निर्माण कार्य में पहाड़ी बोल्डर के साथ जंगल की ही गिट्टी व रेत का उपयोग करना बताया गया हैं। जिस ओर वन विभाग में इंजीनियर नही होने से जिले के उच्च अधिकारियों द्वारा भी ध्यान नहीं दिया जा रहा है। जिससे कई सवाल खड़े हो रहे हैं। वहीं निर्माण स्थल पर कोई बोर्ड नहीं लगा है, जिससे लोगों को इसकी जानकारी मिल सके कि स्टाप डेम कौन से योजना के अंतर्गत बन रहा हैं, उसकी लागत कितनी है और निर्माण एजेंसी का क्या नाम हैं। नीव खुदाई का कार्य भी सही ढंग से नहीं किया गया है। निर्माण के दौरान माप-दंड का पालन भी नहीं किया गया है।जब कि इसी लागत में अन्य विभाग का स्टॉप डेम और भी बेहतर तरीके से बनाया जा सकता हैं वही स्टॉप डेम को देखकर नही लगता कि भविष्य में इस योजना से वन्य जीवों को भी लाभ मिलेगा क्यो की स्टॉप डेम तो बना दिया गया किन्तु मिट्टी सही तरीके से नही हटाया गया हैं जिससे पहली बारिश में ही उसमें मिट्टी भरने की संभावना हैं ! वही जंगल से जमकर गिट्टी की तोड़ाई वन विभाग के अधिकारी के निर्देश पर फॉरेस्ट गार्ड द्वारा करवाया गया था.साथ ही रेता भी अवैध तरीके से नदी से निकालकर उपयोग करने का आरोप ग्रामीणों ने लगाया ।
बहरहाल यदि ग्रामीणों के लगाए आरोप को आधार बनाकर दूसरे विभाग से इसकी जाच करायी जाये तो शासकीय राशि के गलत उपयोग करने पर अधिकारियों पर कार्यवाही की गाज गिर सकती हैं किन्तु वन विभाग में दर्जनों शिकायत के बाद भी अब तक उच्च अधिकारियों के कानों में जु तक नही रेंगा जिससे अब जाच के नाम पर केवल खानापूर्ति करने की बात कही जा रही वही चर्चा है कि वन विभाग के अधिकारियों के द्वारा जाच में उच्च अधिकारियों के फसने के डर से जाच फाइल को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है जब कि जाच में ओर भी कई खुलासे हो सकते है।
