1 मई
मजदूर दिवस
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भले ही दर्द मेरा न समझे न कोई यहाँ।
बोझ दुनियां का हरदम उठाकर चला हूँ।

रेशमी उन लिबासों की चाहत नहीं
फटी अपनी कमीजों को सीकर चला हूँ।

चाँद तारों से रोशन घर उनका रहे
अंधेरों को इसलिए पीकर चला हूँ।

दावत मिले रोज मुझे शौक इसका नहीं
भरने को पेट सूखी रोटी खाकर चला हूँ।

इबारत रखता हूँ मैं आलीशान बंगलों की,
झोपड़ी में अपनी मैं खुश होकर चला हूँ।

दौड़ती राहों में चमचमाती कारें मुझसे ही,
इन्हीं सड़कों पर नंगे पाँव चलकर चला हूँ।

सदियों से भटकता रहा हूँ दरबदर
घर अपना मैं सब कुछ छोड़कर चला हूँ।

भले ही दर्द मेरा न समझे है कोई यहाँ
बोझ दुनियां के हरदम उठाकर चला हूँ।

🌹🌹🙏🏻सुप्रभात🙏🏻🌹🌹

डॉ.अन्नपूर्णा जवाहर देवांगन
महासमुंद छ.ग.