युक्तियुक्तिकरण नहीं, शिक्षायुक्त छत्तीसगढ़ चाहिए,-हरीश साहू अध्यक्ष सरपंच संघ।

राजिम :- छत्तीसगढ़ ने बताया छत्तीसगढ़ सरकार की युक्तियुक्तिकरण नीति का उद्देश्य भले ही शिक्षक संसाधनों का बेहतर प्रबंधन हो, लेकिन इसकी क्रियान्वयन की हकीकत ग्रामीण, आदिवासी और दूरस्थ अंचलों के बच्चों के भविष्य पर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर रही है। स्कूलों से शिक्षकों का हटना और पदों का रिक्त रह जाना, शिक्षा व्यवस्था को खोखला बना रहा है, RTE कानून की खुली अवहेलना”शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009″ (Right to Education Act) की धारा 25 स्पष्ट रूप से कहती है:प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षक-छात्र अनुपात अधिकतम 30:1 हो।उच्च प्राथमिक स्तर पर यह अनुपात 35:1 तक हो सकता है। प्रत्येक विद्यालय में एक प्रधानपाठक की नियुक्ति अनिवार्य है। लेकिन ज़मीनी हकीकत क्या है? कई विद्यालयों में सिर्फ एक शिक्षक कार्यरत हैं। वह शिक्षक भी प्रधानपाठक की जिम्मेदारी निभाते हुए 5 कक्षाओं को पढ़ाने के लिए मजबूर हैं।इससे शिक्षा की गुणवत्ता बुरी तरह प्रभावित हो रही है। नीति या सस्ते में निपटाने की कोशिश? इस नीति के पीछे जो तर्क दिए जा रहे हैं, वह कहीं न कहीं ‘कटौती’ और ‘संकुचन’ की नीति ज्यादा लगती है। शिक्षकों को दूरस्थ क्षेत्रों से हटाकर मुख्यालय में समायोजित किया जा रहा है। कई स्कूलों को “गैर-जरूरी” बताकर बंदी की कगार पर ला दिया गया है। और जहां बच्चे हैं, वहां शिक्षक नहीं; और जहां शिक्षक हैं, वहां छात्रों की संख्या नगण्य। क्या यही है “गढ़बो नवा छत्तीसगढ़”? सरपंच संघ की चार सूत्रीय मांग, प्रदेश के हज़ारों सरपंचों और जनप्रतिनिधियों की ओर से हम शासन से यह स्पष्ट माँग करते हैं। की युक्तियुक्तिकरण नीति की पुनर्समीक्षा तत्काल की जाए।

दूसरा सभी रिक्त पदों पर स्थायी शिक्षकों की शीघ्र भर्ती की जाए।

एवं ग्रामीण, पहाड़ी और आदिवासी क्षेत्रों को विशेष प्राथमिकता में रखते हुए अतिरिक्त शिक्षकों की नियुक्ति की जाए तथा हर विद्यालय में प्रधानपाठक की अनिवार्य उपस्थिति सुनिश्चित की जाए। यह सरकार विरोध नहीं, नीतिगत सुधार की गुहार है , हम सरकार की नीयत पर सवाल नहीं उठा रहे, पर नीति के क्रियान्वयन पर ज़रूर सवाल है। स्कूल भवन बना देना भर शिक्षा नहीं है, उनमें शिक्षक और सशक्त शिक्षण व्यवस्था भी चाहिए। जब तक शिक्षा की नींव नहीं मजबूत होगी, तब तक “गढ़बो नवा छत्तीसगढ़” सिर्फ एक नारा बनकर रह जाएगा।