छत्तीसगढ़ी राजभाषा स्थापना दिवस पर आस्था की काव्य गोष्ठी का किया गया आयोजन।

प्रमोद दुबे 

महासमुंद – आस्था साहित्य समिति महासमुंद द्वारा छत्तीसगढ़ी राजभाषा स्थापना दिवस के अवसर पर साहित्य डॉ साधना कसार के निवास पर काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया ।अध्यक्षता करते हुये वरिष्ठ साहित्यकार एवं छत्तीसगढ़ी भाषा के सशक्त हस्ताक्षर आनंद तिवारी पौराणिक ने कहा कि मया के अमरित बानी, गंगा के पबरित पानी पुतरी आंखी के अन्तस के सुवांसा लहू म महतारी भासा। उन्होंने छत्तीसगढ़ी की महत्ता पर प्रकाश डालते हुये हमारे लिये अमूल्य बताया । साहित्यकार श्रीमती एस चन्द्रसेन ने पंक्तियां समर्पित करते हुये महतारी भासा की वंदना की बन्दत हौ मोर छत्तीसगढ़ी महतारी भुईयां के माटी रोटी गुरतुर बानी। छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध साहित्यकार बन्धु राजेश्वर खरे ने कहा कि अपन गांव, नता गोता जात धरम के, जब मनखे ला नसा चढ़ जाथे तब ओहा मनखे नइ रहि जाय मनुख बाहिर, मनुख मार, मनुष खया हो जायें। साहित्यकार उमेश भारती मृदुल ने छत्तीसगढ़ी व्यंग्य रचना पढ़ते हुये कहा कि चलो मिलके एक नवां गीत गुनगुनाबो, जिनगी ल नवां सुरताल म सजाबो । इस अवसर पर पत्रकार व साहित्यकार उत्तरा विदानी गांव व गलियों की पारंपरिक गीत सुनाकर सबको मंत्र मुग्ध कर दिया काबर समाये रे मोर बैरी नैना मंए सुनाया। सुजाजाता विश्वनाथन ने किस्मत ल झन कोस मितान अलाली के तोर दोस मितान सुनाकर खूब गुदगुदाया। आयोजनकर्ता डॉ साधना कसार ने कहा कि दुलहिन सिंगार बिन, परिवार संस्कार बिन रिस्ता नेह बिन, बने नई लागय। कार्यक्रम का अपने अनूठे अंदाज में संचालन करते हुये साहित्यकार टेकराम सेन चमक ने काव्य गोष्ठी को ऊंचाईयां देते हुये कहा कि जल जंगल जमीन इहां के पहचान है, आदिवासी संस्कृति इहां के मान है, सुआ ददरियां, करमा जिहा गावत फिरते नोनी ह तिहां के भाखा ल मोर बारम्बार परणाम है। साहित्य प्रेमी एवं शिक्षाविद् केआर चंद्राकर, एमआर विश्वनाथन ने छत्तीसगढ़ी भाषा के इतिहास पर प्रकाश डालते हुये महत्वपूर्ण जानकारियां दी। आभार प्रदर्शन वरिष्ठ अधिवक्ता भरत सिंह कसार ने किया ।