‘बेटी पढ़ाओ-बेटी बढ़ाओ’ अभियान को किया शर्मशार।
प्रमोद दुबे
पिथौरा/महासमुंद – प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की केंद्र सरकार से लेकर मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की प्रदेश सरकार तक तमाम भाजपाई ‘बेटी पढ़ाओ-बेटी बढ़ाओ’ और ‘शिक्षा का अधिकार’ के चाहे जितने नारे लगा लें, जमीनी हकीकत से वे भी पूरी तरह बेखबर हैं! जाति प्रमाण पत्र के नाम पर एक पढ़ने वाली बेटी को पढ़ाई छोड़कर मजदूरी करने के लिए विवश होना पड़ जाए, इस बात पर अपने सामंती नौकरशाहों के सिस्टम को लेकर आज बात-बात पर कांग्रेस की सरकारों को कोसने वाले भाजपा नेता भी शायद ही शर्मसार हो रहे होंगे। यह शर्मनाक वाकया पिथौरा के कन्या शाला का है, जहाँ एक बच्ची खुद को अपमानित महसूस कर पढ़ाई छोड़ने के लिए विवश हुई है। बेटी पढ़ाओ, बेटी बढ़ाओ के राष्ट्रीय स्तर के नारे को स्थानीय शासकीय कन्या स्कूल के प्राचार्य व स्टाफ ने शर्मसार कर दिया है।
इस बारे में स्कूल स्टाफ ने बताया कि जिनका जाति प्रमाण पत्र नहीं बना था, उन्हें नियमानुसार प्रवेश नहीं दिया गया है। कक्षा 8वीं में मिडिल स्कूल से पढ़ाई पूरी करके नगर के वार्ड-8 की इस छात्रा ने आगे की पढ़ाई के लिए स्थानीय कन्या शाला में प्रवेश के लिए स्थानांतरण प्रमाण पत्र के साथ आवेदन किया था। छात्रा के अनुसार, वह स्कूल जा रही थी, पर उसे कक्षा शिक्षक ने न तो सरकारी पुस्तक-कॉपी दी और न ही उसका नाम उपस्थिति पंजी में दर्ज नही किया। वह प्रतिदिन अपना नाम उपस्थिति के लिए नहीं पुकारे जाने से अपमानित महसूस कर रही थी। छात्रा के अनुसार जब उसने इसका कारण कक्षा शिक्षक से पूछा, तब उन्होंने बताया कि जाति प्रमाण पत्र नहीं बना है, इसलिए प्रवेश नहीं हो सकता। बाद से उक्त छात्रा स्कूल जाने से वंचित हो गई। अब सवाल यह है इस अंधेरगर्दी का दोषी कौन है, स्वयं वह छात्रा या फिर वह तंत्र, जिसके निकम्मेपन के कारण उक्त छात्रा का जाति प्रमाण पत्र नहीं बन पाया है?
उक्त छात्रा ने इस प्रतिनिधि को बताया कि वह स्थानीय पुरानी बस्ती के वार्ड-8 में माँ व दो बहनों के साथ रहती है। पिता बाहर रहते हैं। माँ व बड़ी बहन मजदूरी कर दोनों छोटी बहनों को पढ़ाना चाहती हैं, पर गरीबी के चलते वह अपनी बहनों का प्रवेश सरकारी स्कूल में भी नहीं करा पाईं, क्योंकि अशिक्षा के कारण छोटी बहन का आधार कार्ड नहीं बना था और इसकी वजह यह थी कि एक आधार सेंटर वाले ने आधार कार्ड बनाने का खर्च 1100 रुपए बताया। दूसरी बहन का जाति प्रमाण पत्र नहीं था, जिसके कारण दोनों पढ़ाई से वंचित हो रही थीं। तब उन्हें उनके एक पड़ोसी ने इस प्रतिनिधि के पास सहायता के लिए भेजा। इस प्रतिनिधि के प्रयास से छोटी बहन का प्रवेश
पहली कक्षा में हो गया, पर उसकी दूसरी बहन का भविष्य कन्या हाई स्कूल के स्टाफ ने प्रवेश न देकर बर्बाद कर दिया, जिसका उन्हें आजीवन अफसोस रहेगा। अब माँ- बेटी चाहती हैं कि दोनों छोटी बेटियां पढ़-लिखकर कोई अच्छी नौकरी या काम करें।
बगैर प्रवेश कक्षा में दी बैठने की अनुमति
मामले की जानकारी मिलते ही इस प्रतिनिधि ने कन्या हाई स्कूल के प्राचार्य बरिहा से सम्पर्क किया। इस पर उन्होंने अनभिज्ञता जाहिर करते हुए इसे क्लास टीचर का मामला बताकर अपना पल्ला झाड़ लिया। जब शासन की कन्या योजना की बात की गई, तब प्राचार्य ने उसके प्रवेश से इनकार करते हुए बगैर प्रवेश कक्षा में बैठने की अनुमति दे दी। छात्रा के पढ़ने के जज्बे को देखते हुए एक अन्य शासकीय स्कूल के शिक्षक ने छात्रा को पुस्तक- कॉपियां दी हैं।
प्राचार्य ने दी ओपन परीक्षा की सलाह
शासकीय कन्या हाई स्कूल के प्राचार्य ने उक्त छात्रा को प्रवेश तो नहीं दिया, पर सलाह दे दी कि अब वह ओपन परीक्षा में बैठकर अंकसूची ले सकती है। प्राचार्य व स्कूल प्रबंधन अपनी हरकतों से शासन की मंशा पर पानी फेरते हुए एक और छात्रा का भविष्य खराब करने का प्रयास कर रहे हैं। बहरहाल, यह परिवार चाहता है कि उन्हें अन्य छात्राओं की तरह स्कूल में प्रवेश दिया जाए, जिससे वह उत्साह से पढ़ाई कर भविष्य बना सके।
