आज के इस खौफनाक माहौल के लिए कुछ पंक्तियां
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बाहर की आबोहवा में घुली
अभी “खौफनाक मंजर” है,
जरा सम्भल कर रहना ‘ऐ दोस्त’
तेरे हर तरफ ‘मौत का बवंडर’है
कोई भी शख्स, मौत-ए-अजीज बन सकता है,
जो है तेरा ‘हबीब’ ,कल ‘रकीब’ बन सकता है
हर चेहरे पे छिपा अनजाना सा “मछंदर” है….
जरा सम्भल कर….
किससे बचें,और कैसे ?ये भी तो पता नहीं ,
उसकी सजा भी तो मिलेगी ,जो खता नहीं
कोशिश करो कि तैर जाओ,ये दर्द का समंदर है…
जरा सम्भल कर…
उम्मीद से तू साथ, कुछ यूं निभा के चल,
हर एक से मिले अगर,दामन बचा के चल
दे मात तू इस खौफ को ,बन जाए गर सिकंदर है…
ज़रा सम्भल कर….
(घर पर रहिए, सुरक्षित रहिए)
पुष्पलता भार्गव ‘सुनंदा’ महासमुंद

