“मंदिर की स्थापना, पूजन में है भक्त
जैसे साधु हो गए, तन के सारे रक्त”
सुरेन्द्र मिनोचा
मनेद्रगढ़ :- श्री राम के वनवास काल का छत्तीसगढ़ में पहला पड़ाव सीतामढ़ी हरचौका है, जहां-जहां प्रभु श्री राम के चरण पड़े, वह भूमि धन्य हो गई।उक्ताशय के विचार पतंजलि योग समिति के वरिष्ठ योगाचार्य एवं संबोधन साहित्य एवं कला संस्थान के साहित्य प्रमुख सतीश उपाध्याय ने” “दंडकारण्य और प्रभु राम “विषय पर आयोजित आध्यात्मिक संगोष्ठी एवं विचार परिचर्चा में व्यक्त किया ,कार्यक्रम का प्रारंभ में देश के सुप्रसिद्ध साहित्यकार गिरीश पकंज के गीत- “आएंगे हमारे प्रभु राम ,अवध में धूम मची “से प्रारंभ किया गया, जिसे स्वर डॉ मंजुला उपाध्याय (रायपुर)ने दिया है, प्रस्तुत किया गया।
“प्रभु राम एवं दंडकारण्य “विषय पर विष्णु प्रसाद कोरी ने छत्तीसगढ़ की पौराणिक घटनाक्रमों का उल्लेख करते हुए कहा कि -राम के दिव्य जीवन से छत्तीसगढ़ का गौरवशाली संबंध रहा है ।श्री राम विष्णु के अवतार तो है लेकिन उससे पहले वह मनुष्य हैं। दंडकारण्य में श्री राम के विषय पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि छत्तीसगढ़ को भगवान श्री राम का ननिहाल भी माना जाता है, वनवास की बड़ी अवधि प्रभु श्री राम ने यहां गुजारी इसलिए छत्तीसगढ़ से प्रभु राम का गहरा पावन रिश्ता रहा है ।इसका बाल्मीकि रामायण में भी उल्लेख मिलता है।

शिक्षिका एवं योग साधिका नीलम दुबे ने प्रभु राम के दिव्य अलौकिक पक्षों का उल्लेख करते हुए अपनी कविता में प्रभु राम की स्तुति की।अयोध्या निवासी एवं पतंजलि योग समिति से जुड़े कैलाश दुबे ने, प्रभु राम के साथ “भरत “के जीवन चरित्र , एवं अयोध्या में प्रभु राम के कई प्रमाणित एवं पौराणिक साक्ष्यों का मार्मिक ढंग से वर्णन किया। कैलाश दुबे ने राम ,लक्ष्मण ,शत्रुघ्न के साथ भरत’ को त्रेता युग का महाप्रतापी, त्यागी पुरुष बताया। कार्यक्रम संयोजक सतीश उपाध्याय ने “सरयू की जलधार -” प्रभावी दोहे से अयोध्या की अप्रतिम एवं पावन धाम के माहात्म्य पर पंक्तियां पढी।
“मंदिर की स्थापना
पूजन में है भक्त ,
जैसे साधु हो गए
तन के सारे रक्त”।
संबोधन साहित्य एवं कला परिषद के नरेंद्र अरोड़ा ने प्रभु श्री राम के भव्य राम मंदिर एवं प्राण प्रतिष्ठा की चर्चा करते हुए कहा कि पूरे देश में राम के पुण्य प्रताप से सद्भावी समरसता का वातावरण बना हुआ है। डॉ संदीप चंदेल ने कहा कि -श्री राम का स्वयं का जीवन भी संघर्षों से भरा रहा हम राम को जाने उन्हें आत्मसात करें उनके चरित्र को धारण करें यही राम का जन-जन के लिए संदेश है।
संबोधन के वरिष्ठ सदस्य गोपाल प्रसाद बुनकर ने कहा कि-राम शब्द भक्त और भगवान में एकता का बोध कराता है ,भगवान राम ने निषाद राज और केवट को गले लगाकर समाज को सामाजिक समरसता का संदेश दिया है। आज प्रभु राम की अलौकिक दिव्यता से पूरा छत्तीसगढ़ आलोकित है।ओजस्वी वक्ता नारायण प्रसाद तिवारी ने प्रभु राम से जुड़े रामायण कालीन कई अनछुए प्रसंगों को प्रभावी तरीके से प्रस्तुत किया। प्रभु राम के बस्तर के जंगलों से गुजरते हुए , प्रभु राम एवं वनवासियों की वार्तालाप एवं आराध्य शिव की आराधना आदि प्रसंगों की विस्तार से जानकारी दी।उन्होंने सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव, की अयोध्या यात्रा , लंगर सेवा की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि की जानकारी दी। कार्यक्रम का समापन-“आ रहे हैं रामलला अपने भव्य द्वार”के उद्घोष से किया गया कार्यक्रम का संचालन एवं संयोजन सतीश उपाध्याय ने किया।
