सुरेन्द्र मिनोचा
एमसीबी :- 500 वर्षों के कठिन संघर्ष और कई पीढ़ियों के बलिदान का सुफल है कि आज अयोध्या में मर्यादा पुरुषोत्तम राम का वैभवशाली मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा होने जा रही है।
राम का चरित्र ही समरसता का श्रेष्ठतम और सर्वाधिक प्रभावी उदाहरण है। वे वन तो गए थे राजकुमार बनकर ,किंतु लौटे तो मर्यादा पुरुषोत्तम परमात्मा कहलाए।वनवास के दौरान उन्होंने समरसता के कई आदर्श उदाहरण प्रस्तुत किए।निषाद राज को गले लगाया,शबरी के झूठे बेर खाए।उनका हर संघर्ष ,हर मार्ग सत्यमेव जयते की प्रतिष्ठा का परिचायक है ।
मार्ग चाहे जितना कठिन हो बिना हताश एवं निराश हुए आगे बढ़ते रहेंगे तो गंतव्य तक पहुंचेंगे ही।
श्री राम का स्वयं का जीवन भी संघर्षों से भरा रहा।हम राम को जाने उन्हें आत्मसात करें उनके चरित्र को धारण करें।यही राम का जन-जन के लिए संदेश है।
ऐसा बताया जाता है कि अपने वनवास काल के दौरान भगवान राम ने ज्यादातर समय बस्तर दंडकारण्य के जंगलों में बिताया था।बस्तर की जीवनदायनी कहीं जाने वाली इंद्रावती नदी के किनारे वे रहे,आज वहां एक मंदिर है। इस मंदिर में भगवान राम के वनवास काल के दौरान बस्तर से जुड़ी कहानियों को चित्रों और मूर्तियों के रूप में उकेरा जा रहा है । राम की प्राण प्रतिष्ठा और मर्यादा पुरुषोत्तम राम जी के अयोध्या में निर्मित भव्य मंदिर वास्तव में यह एक वैश्विक उत्सव है ।जहां-जहां प्रवासी भारतीय बसें हैं वहां भी राम जन्मोत्सव मनाया जा रहा है।
राम कथा विश्व व्यापी लोकप्रिय भी है ।राम केवल इतिहास पुरुष ही नहीं हमारी आस्था के पुरुष हैं। राम कथा मनुष्य को देवता बना सकती हैं क्योंकि उसमें मानवीय मूल्यों के प्रमाणित दस्तावेज है सत्य की बुनियाद पर रचित कहानी है।भारतीय जीवन के हर पहलू पर राम और उनके जीवन आदर्शों की छाप देखी जा सकती है। हर्ष, शोक, विषाद, उल्लास, हताशा में सारे मनोभावों को राम शब्द में देखा जा सकता है।
राम सबके हैं, श्री राम सनातन भारत भूमि के तो हैं ही संपूर्ण विश्व और मानव वसुंधरा की हर प्राणी के हैं। विश्व की हर समस्या का समाधान भी हैं ।श्री राम इस त्रेता युग में धरती पर अवतार लेने से लेकर मां सरयू की गोद में अंतिम प्रवास तक श्री राम ने अपने पूरे कालखंड में संपूर्ण समाज को एक सूत्र में पिरोने का ही काम किया ।उन्होंने वनवासियों, ग्रामीण अंचल के हर वर्ग का सदा सम्मान किया। सभी से श्री राम ने आत्मिक संबंध बनाया ।नस्ल, रंग, वर्ण का उनके जीवन में कोई महत्व नहीं रहा ।कोई स्थान नहीं रहा। आज पूरा देश राम में है राम में आध्यात्मिक वातावरण से हिंदू धर्म का सशक्त पुनरुत्थान हो रहा है।
इस ऐतिहासिक घटना का राम भक्त सदियों से इंतजार कर रहे थे। छत्तीसगढ़ से प्रभु राम का जीवन चंदखुरी के बारे में बताते हैं कि युद्ध के दौरान घायल श्री राम के भाई लक्ष्मण की चिकित्सा करने वाले लंका के वैद्य सुषेण को भगवान श्री राम अपने ननिहाल लाए थे ।इनका मंदिर छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से 27 किलोमीटर दूर नगर पंचायत चंदखुरी में मौजूद है।यह भगवान राम की मां कौशल्या का जन्म स्थान माना जाता है ।इस गांव को औषधि ग्राम चंदखुरी भी कहा जाता है। इसके पीछे मान्यता यह भी है कि यहां ऋषि मुनियों का आश्रम था ।
रामचरितमानस के लंका कांड में सुषेण वैद्य का जिक्र आता है। युद्ध में मेघनाथ की शक्ति से लक्ष्मण जब अचेत हो गए थे तब विभीषण ने राम को बताया कि श्रीलंका के राज वैद्य सुषेण लक्ष्मण को बचा सकते हैं श्री राम के कहने पर हनुमान जी सुषेण वैद्य को लंका से, उनके भवन सहित लेकर आए थे।
रायपुर जिले के नगर पंचायत चंदखुरी गांव में सुषेण वैद्य का मंदिर बना है, जिसमें एक बड़ा पत्थर भी रखा हुआ है ऐसा माना जाता है कि सुषेण वैद्य इसी पत्थर पर बैठा करते थे।
कौशल्या माता मंदिर के पुजारी के मान्यता के अनुसार इस मंदिर की मिट्टी की भभूत लगाने से कई लोगों की बीमारी ठीक हो चुकी है।मंदिर परिसर में स्थित वैद्य सुषेण की समाधि भी बनी हुई है, सुषेण वैद्य ने संजीवनी बूटी से दवा बनाकर लक्ष्मण को पुनः चैतन्य किया था। राजिम में 1000 साल पुराना प्राचीन राम मंदिर है जो 11वीं शताब्दी का है, इस मंदिर की प्रसिद्धि तो है लेकिन ज्यादातर लोगों की इसकी ऐतिहासिकता की जानकारी नहीं है ।मंदिर में भगवान श्री रामचंद्र जी, माता जानकी विराजी हुई है, मंदिर का निर्माण कलचुरी काल में राजा जगतपाल द्वारा किया गया था ।
छत्तीसगढ़ को यह भी गौरव जाता है कि यह मंदिर पुरातत्व की धरोहर है। छत्तीसगढ़ के संदर्भ में यह बात भी उल्लेखनीय है कि छत्तीसगढ़ के प्रख्यात पुरातत्ववेत्ता पद्मश्री अरुण कुमार शर्मा हैं ,जिन्होंने अयोध्या के विवादित स्थान में हिंदू मंदिर होने के पुरातात्विक प्रमाण जुटाए। गरियाबंद के मैनपुर विकासखंड के घने जंगल और कांदाडोंगर की पहाड़ी में माता सीता की खोज करते हुए प्रभु श्री राम और भाई लक्ष्मण पहुंचे थे ।उन्होंने कुछ समय इसी पहाड़ी पर बिताया था ,जिसका प्रमाण आज भी इस पहाड़ी में मिलता है ।यहां लक्ष्मण झूला ,हनुमान झूला के साथ ऋषि मुनियों द्वारा तप किए गए स्थल आज भी मौजूद हैं जो धार्मिक आस्था का केंद्र है ।
तहसील मुख्यालय मैनपुर से लगभग 70 किलोमीटर दूर कांदा डोंगर पहाड़ी है इस पहाड़ी में विशेष लिपि में कई आलेखों का उल्लेख है, इसके बारे में लोग अनेक प्रकार की जानकारी देते हैं। त्रेता युग में जब रावण ने माता सीता का हरण किया था तब भगवान श्री राम और भाई लक्ष्मण माता सीता की खोज में इस पहाड़ी पर पहुंचे थे ।
मैनपुर ब्लॉक के ग्राम गोड़ीयारी स्थित कांदा डोंगर पहाड़ी अपनी प्राकृतिक खूबसूरती के लिए प्रसिद्ध है बताते हैं कि इसी पहाड़ी में शरभंग ऋषि तपस्या किए थे। यहां इनका आश्रम भी है ।जो योगी मठ के नाम से जाना जाता है। 14 वर्ष के वनवास काल में प्रभु राम का अधिकांश समय छत्तीसगढ़ में व्यतीत करने की मान्यता है। रामायण कथा में छत्तीसगढ़ दक्षिण कौशल प्रवास के वृतांत हैं ।रामगढ़ स्थित गुफा में राम जी की महर्षि विश्वा से भेंट हुई थी ,रामगढ़ की एक गुफा में राम जी के पद चिन्ह मिलने की जन श्रुति है। जोंक महानदी और शिवनाथ नदी का संगम स्थल शिवरीनारायण जहां राम जी ने शबरी के झूठे बेर खाए थे ।बालुकिनी पर्वत के समीप स्थित तुरतुरिया में आदि कवि वाल्मीकि का आश्रम था ,जहां राम सीता के पुत्र लव- कुश की जन्मस्थली होने की मान्यता है।
चंदखुरी में लंका के राजा रावण के राज वैद्य का समाधि स्थल है जिनके परामर्श पर हनुमान जी ने संजीवनी लाई थी ।
14 वर्ष के वनवास के दौरान राम जी ने राजिम में अपने कुल देवता महादेव की पूजा अर्चना की थी । यहां लोमश ऋषि का भी आश्रम हैं। मान्यताओं के अनुसार प्रभु राम जी यहां कुछ समय व्यतीत किए थे। राजिम में सीता वाटिका भी है।सिहावा के पर्वतों में सप्त ऋषियों ,श्रृंगी ऋषि, कंक ऋषि ,गौतम ऋषि, शरभंग ऋषि, अंगिरा ऋषि, अगस्त ऋषि, मुचकुंद ऋषि के आश्रम हैं ।बताया जाता है कि रामचंद्र जी ने इन्हीं आश्रमों में ऋषियों से धर्म की शिक्षा प्राप्त की थी। श्रृंगी ऋषि द्वारा पुत्रयेष्ठि यज्ञ के फल स्वरुप माता कौशल्या द्वारा राम जी को जन्म देने की किंवदंती भी है। राम जी ने वनवास के दौरान जगदलपुर वन क्षेत्र से होकर वनों में प्रवेश किया था
चित्रकोट और तीरथगढ़ जलप्रपात के समीप कुटी बनाकर राम जी ,पत्नी सीता लघु भ्राता लक्ष्मण जी के साथ कुछ वर्ष व्यतीत किए थे।
संत कबीर से लेकर गुरु नानक देव, महर्षि अष्टावक्र, ,केशव, निराला, मैथिली शरण गुप्त ,अल्लामा इकबाल जैसे हर भाषा हर धर्म को मानने वाले महापुरुषों ने अपने-अपने ढंग से राम के बारे में लिखा है।
राम शब्द भक्त और भगवान में एकता का बोध कराता है। महर्षि अष्टावक्र गीता में आठवीं सदी में राम के महात्म को लिखा गया है।
महात्मा गांधी ने भी राम को न केवल आत्मसात किया बल्कि जनता को न्याय देने के बड़े उद्देश्य से राम राज्य की कल्पना की थी।
छत्तीसगढ़ में प्रभु राम की लोक कथा आस्था का केंद्र बिंदु है। छत्तीसगढ़ में उनसे जुड़े अनेक स्थान है जो उनके जीवन प्रसंगों को रेखांकित करते हैं।
खरौद को खरदूषण की राजधानी माना जाता है। छत्तीसगढ़ में रामनामी संप्रदाय रहते हैं ,जो प्रभु राम के निराकार रूप की भक्ति को ही जीवन का आधार मानते हैं। छत्तीसगढ़ी ऋषि मुनियों का भी प्रदेश रहा है ।वनवासी राम का संपूर्ण जीवन सामाजिक समरसता का प्रतीक है। राम जी ने वन गमन के समय हमेशा समाज के अंतिम व्यक्ति को गले लगाया।केवट को भगवान राम ने गले लगा कर समाज को यह संदेश दिया कि प्रत्येक मनुष्य के अंदर एक जीव आत्मा है।
रायपुर से मात्र 27 किलोमीटर दूर आरंग तहसील के गांव चंदखुरी में माता कौशल्या का ऐतिहासिक मंदिर है। चंदखुरी का सौंदर्य पुरानी कथाओं जैसा आकर्षक हो गया है।
राम वन गमन पर्यटन परिपथ का भी विकास किया गया है। छत्तीसगढ़ के विद्वान शोधकर्ताओं तथा देश के अन्य शोधकर्ताओं ने यह प्रमाणित किया है कि राम जी ने अपनी पत्नी सीता लघु भ्राता लक्ष्मण के साथ 14 वर्षीय वनवास के दौरान छत्तीसगढ़ सहित भारतवर्ष में लगभग 10000 किलोमीटर लंबी यात्रा की थी और 248 प्रमुख स्थलों पर रुके थे ,जिनमें सिर्फ छत्तीसगढ़ में ही उन स्थलों की संख्या लगभग 75 है ।14 वर्षों में 10 वर्ष से अधिक का समय उन्होंने छत्तीसगढ़ के घने जंगलों में बिताया।
शोधकर्ताओं के अनुसार प्रभु राम का वन गमन अयोध्या उत्तर प्रदेश से शुरू होकर मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र आंध्र प्रदेश ,कर्नाटक, तमिलनाडु, और केरल से होकर श्रीलंका में जाकर समाप्त हुआ।
वनवास काल के प्रथम पड़ाव सीतामढ़ी हरचौका को कहा जाता है ,जहां गुफाओं के 17 कक्ष है और सीता की रसोई भी है।
सरगुजा जिले में स्थित रामगढ़ की पहाड़ी में तीन कक्षों वाली सीता बेंगरा गुफा है। ऐसी मान्यता है कि इसी गुफा में राम जी की कई प्रतापी ऋषि मुनियों से मिले थे।
विद्वानों के अनुसार रामगढ़ भारत की सबसे प्राचीन नाट्य शाला मानी जाती है ,यहां कभी कालिदास ने अपनी कालजयी काव्य “मेघदूतम” की रचना की थी। किंवदंती के अनुसार यही बालुकिनी पर्वत के समीप आदि कवि वाल्मीकि का आश्रम था, और यही राम सीता के पुत्रों लव व कुश का जन्म हुआ था। ऋषि मुनियों की तपस्थली सिहावा धमतरी जिले में है यहां के विभिन्न पहाड़ियों में श्रृंगी ऋषि कंक ऋषि, गौतम ऋषि, शरभंग ऋषि, अंगिरा ऋषि ,अगस्त ऋषि, मुच कुंद ऋषि आदि के आश्रम हैं।
चारों दिशाओं में घने वनों और पहाड़ों से गिरे बस्तर जिला मुख्यालय जगदलपुर क्षेत्र से भगवान राम ने वन गमन किया था और शोधकर्ताओं के अनुसार राम जी इसी रास्ते से होकर भद्राचलम( आंध्र प्रदेश) की ओर गए थे राम वन गमन पर्यटन परिपथ के विकास से छत्तीसगढ़ की पूरे देश में अलग पहचान बनी है।प्रभु श्री राम के भव्य राम मंदिर एवं प्राण प्रतिष्ठा से पूरे देश में राम के पुण्य प्रताप से सद्भावी समरसता का वातावरण है ,जो देश की एकता, अखंडता के लिए जरूरी भी है।
प्रभु राम की अलौकिक दिव्यता से गौरवान्वित है छत्तीसगढ़: सतीश उपाध्याय।
