ऐतिहासिक ग्राम खल्लारी को देवी माता खल्लारी के रूप में स्मरण किया जाता है।

प्रमोद कुमार दुबे
महासमुंद :- छत्तीसगढ़ राज्य में महासमुंद जिले के ऐतिहासिक ग्राम खल्लारी को देवी माता खल्लारी के रूप में स्मरण किया जाता है। भीमखोज से 2 किलोमीटर दूरी पर पश्चिम दिशा में स्थित खल्लारी की कुल क्षेत्रफल 20135 एकड़ है। उत्तर में ग्राम कन्हारपुरी, दक्षिण में भीमखोज, पूर्व में बोईरगांव, आवराडबरी तथा खल्लारी के दक्षिण में लगभग 280 एकड़ की पहाड़ी है जिस पर स्थित खल्लारी माता का मंदिर है। प्राचीन काल में खल्लारी को मृतकागढ़ या खल्लवाटिका के नाम से पहचाना जाता था। हैह्यवंशी राजा हरि ब्रह्मदेव की राजधानी होने से खल्लारी तत्कालीन आदिवासी के अधीनस्थ था।

तब इसे मृतकागढ़ कहां जाता था। कालांतर में राजा ब्रह्मदेव खल्लारी को जब अपनी राजधानी बनाया तो खल्लवाटिका के रक्षक के रूप में आराधना करते हुए खल्लारी देवी शक्ति स्वरूपा मूर्ति की स्थापना की गई। संभवतः इसी कारण खल्लारी का नाम खाल्लवाटिका हुआ। छत्तीसगढ़ का इतिहास द्रविड़ प्रागैतिहासिक संस्कृति रामायण, महाभारत, गुप्त वंश, बौद्ध जैन युग, मराठा युग, संस्कृति आर्य कल्चुरी वंश तथा अंग्रेजी युग से श्रृंखलाबद्ध रहा है। खल्लारी में प्राप्त शिलालेख 1471 से ज्ञात होता है की खल्लारी में हैह्य वंशियों का शासन था। जैन श्रुति है, की महाभारत काल में पांडवों ने खल्लारी में शासन किया था। पहाड़ी के ऊपर स्थित कुछ गढ्ढों को भीम के पांव के निशान माना जाता है। गांव के पूर्व में स्थित भग्नावशेषी मंदिर लाखा महल या लख सेरी गुड्डी इस आधार पर कहा जाता है कि लाखा महल कौरवों द्वारा पांडवों के लिए बनाया गया था। आज भी यह विश्वास निहित है, की लाखा महल (लाखा गृह) ग्रीष्म क ल में उबलता है तथा इसमें से लाख की महक आती है। बताया जाता है कि इसके भीतरी हिस्से में एक सुरंग स्थित है जो ग्राम से 2 किलोमीटर दूर पहाड़ी में निकलती है। बताया जाता है कि रतनपुर के हैह्यवंशीयों का रायपुर एवं खल्लारी को रायपुर राज्य में मिला लिया गया। अपने शासनकाल में मराठों ने छत्तीसगढ़ को परगनों गढ़ों की इकाई को समाप्त कर परगनों का अस्तित्व में लाया गया। छत्तीसगढ़ के 27 परगनों में खल्लारी एक था जिसके 84 ग्रामों में मराठों को रकौली अदा किया जाता था। काया विजदार के रूप में परगनाधिकारी सूबेदार के प्रति उत्तरदायी था। पश्चात् ताहुलदारी प्रथा प्रारंभ की गई जिससे समीपस्थ ग्रामों का एक चक्र बनाया गया। ऐसे चक्रों के समूह पर एक ताहुलदार नियुक्त किया जाता था। 12 ग्रामों का समूह ग्राम तालुका रखा गया और कई ग्रामों को मिलाकर परगना का गठन किया गया। इस प्रकार खल्लारी परगना में सात तालुका के अंतर्गत 84 ग्राम आते थे। तालुके का प्रमुख पटेल ग्राम का गौटिया मालगुजार कहा जाता था। खल्लारी में चार मालगुजार होने की जानकारी बताई जाती है। खल्लारी का प्रथम मालगुजार गढ़ाई गौटिया, बाद में हनुमान गिरी, काल क्रम माल गुजारी मारकखंडे गोसाई से स्थानांतरित हो करदास मोहता(खामगांव) तक जो खल्लारी का अंतिम मालगुजार बताया जाता है। सन् 1929- 30 में राय साह नारायण राठी खल्लारी का नंबरदार था जो मिल्कियत के रूप में ब्रिटिश शासन में सालाना राशि पटाता था। खल्लारी के मंदिरों में महत्वपूर्ण जगन्नाथ मंदिर भी है। यहां प्राप्त शिलालेख से ज्ञात होता है कि इसका निर्माण सन् 1471 में देव वाल नामक मोची ने करवाया था। पत्थरों से निर्मित प्रवेश द्वार के ऊपर पूर्व में श्री गणेश जी मां काली की मूर्ति है। कल्चुरी नरेश हरिब्रह्म देव के शासनकाल में बनी मूर्ति को स्थापित किया गया है। पहाड़ा वाली खल्लारी माता का मंदिर अत्यंत छोटा था जिसमें मुश्किल से दो व्यक्ति बैठ पाते थे। सन् 1856 में मंदिर को तोड़कर पक्की ईटों से बड़ा स्वरूप प्रदान किया है। पूर्व में स्थापित मूर्ति खंडित हो जाने के कारण इसे बदलकर संगमरमर की मूर्ति स्थापित की गई है। मंदिर तक पहुंचाने के लिए 500 सीढ़ियों का निर्माण तथा सड़क से पहाड़ वाली मां खल्लारी की दूरी लगभग 1672 फिट है। सन् 1983 -84 में पूर्व जिलाधीश (रायपुर) रणवीर सिंह और तत्कालीन संभागीय यंत्री (विद्युत) के.पी. राव के मार्गदर्शन में विद्युतीकरण किया गया। विद्युतीकरण का उद्घाटन पूर्व विधायक लक्ष्मी नारायण इंदुरिया ने 13 अप्रैल 1984 को किया माता के प्रतीक स्वरूप बने छोटे मंदिर का निर्माण पूर्ण तहसीलदार डी.पी. तिवारी द्वारा कराया गया। लोगों की मान्यता है कि खल्लारी माता का आगमन महासमुंद के निकट ग्राम बेमचार से हुआ है। पड़ोसी का रूप धारण कर माता साप्ताहिक बाजार खल्लारी से होते हुए 2 किलोमीटर दूर गुंजन पहाड़ निवासी अपनी खोपरा से मिलने जाती थी। एक दिन गोंड़ नामक बंजारा व्यापारी माता के प्रेम में वंशी भूत होकर बाजार वापसी के समय पीछा करने लगा। माता की चेतावनी के बावजूद जब उसने पीछा करना नहीं छोड़ा तो माता ने कहा कि यदि बंजारा व्यापारी पहाड़ तक आया तो पत्थर में परिवर्तित हो जाएगा। अंततः माता के बातों को ध्यान में न रखकर बंजारा पीछा करने लगा तभी माता के श्राप के कारण गोड़ बंजारा पत्थर में परिवर्तित हो गया। उसे आज गोड़ पत्थर के नाम से जाना जाता है। इस घटना के बाद खल्लारी माता धरती में समा गई पर इसके पूर्व उन्होंने अपने हाथ की उंगलियों को पहचान के स्वरूप पहाड़ के ऊपर रहने दिया। इस स्थल पर कुछ वर्ष पूर्व तक बलि प्रथा जारी थी पर अब वह प्रथा बंद कर दी गई है। ग्राम में प्रवेश करने पर खल्लारी माता का एक और मंदिर मिलता है इस मंदिर के बारे में ऐसा माना जाता है कि यहां के मालगुजार गढ़ाऊ गौटिया को पहाड़ पर स्थित माता ने स्वप्न में आदेश दिया कि मेरी फेंकी गई कटार जहां गिरे वही मूर्ति स्थापित की जाए क्योंकि वृद्ध कमजोर भक्तजन पहाड़ चढ नहीं पाएंगे। अतः उन्हें इस स्थल पर उतना ही पूर्ण मिलेगा जितना ऊपर जाने पर मिलता है। माता के आदेश के अनुसार गौटिया ने मूर्ति स्थापित कर त्रिशूल धारण करने के बाद छोटा सा मंदिर बनवाया। ग्राम में स्थापित देवी देवताओं की पूजा अर्चना तथा भोग चढ़ाना रोजाना पंडितों द्वारा किया जाता है। इस ऐतिहासिक नगरी खल्लारी में पुरातात्विक सामग्री, मूर्ति, धरोहर कई जगह देखने को मिलते हैं, जिसके संरक्षण के लिए क्षेत्र के युवाओं द्वारा, पुरातत्व समिति युवा संघ खल्लारी क्षेत्र केंद्र भीम खोज के नाम से एक समिति बनाई गई है। जिसका उद्देश्य पुरातात्विक धरोहर की जानकारी, समाजसेवा, धर्म आध्यात्मिक इत्यादि है तथा पुरातात्विक धरोहर की देखरेख इन्हीं समिति के द्वारा की जा रही है। धार्मिक देवी मातेश्वरी तीर्थ स्थल खल्लारी धर्म की महान नगरी है जहां विभिन्न समुदायों के द्वारा जगह-जगह बहुत से मंदिरों का निर्माण हुआ है। यहां ग्राम खलारी में ऐतिहासिक प्राचीन मंदिर भी बहुत से हैं उनमें से एक स्वामी जगन्नाथ मंदिर भी है तथा खल्लारी मातेश्वरी मंदिर की देखरेख के लिए ट्रस्ट कमेटी भी बनाई गई है जहां नवरात्रि पर श्रद्धा पूर्वक प्रतिवर्ष धूमधाम से मनाया जाता है। इन दिनों खल्लारी पूरे 9 दिन तक स्वर्ग जैसा बना रहता है। जहां दूर-दूर से लोग मां की दर्शन के लिए आते हैं। यहां श्रद्धा पूर्वक मांगी गई मन्नते मां खल्लारी अवश्य ही पूर्ण करती है। यहां की पहाड़ वाली खल्लारी मातेश्वरी मंदिर में पूरे वर्ष भर अखंड ज्योति प्रज्वलित रहती है तथा सबसे प्रगति में इस समिति में से भंडारा एवं विकास समिति खल्लारी है जिनके द्वारा प्रतिवर्ष धूमधाम से मनाया जाता है। इन दोनों खल्लारी पूरे 9 दिन तक स्वर्ग जैसा बना रहता है। जहां दूर-दूर से लोग मां की दर्शन के लिए आते हैं। यहां श्रद्धा पूर्वक मांगी गई मन्नते मां खल्लारी अवश्य पूर्ण करती है। यहां की पहाड़ वाली खल्लारी मातेश्वरी मंदिर में पूरे वर्ष भर अखंड ज्योति प्रज्वलित रहती है तथा सबसे प्रगति में इस समिति में से भंडारा एवं विकास समिति खल्लारी है जिनके द्वारा प्रतिवर्ष दोनों नवरात्रि पर्व में भव्य भंडारा का आयोजन किया जाता है। जहां श्रद्धालु भक्तगण भोजन के रूप में प्रसाद पाते हैं। यहां एक राग रंग मानस मंडली भी जिनकी चर्चाएं दूर-दूर तक फैली हुई है। तथा उनके द्वारा नवरात्रि में सहयोग करने की अहम भूमिका भी है जिन के प्रमुख चिंताराम सेन है। इस ग्राम का साप्ताहिक बाजार तथा प्रतिवर्ष आयोजित होने वाला मेला आज लाखों श्रद्धालुओं का आकर्षण का केंद्र बना रहता है। इस ग्राम में इस ग्राम में अनेक धार्मिक स्थल है जगन्नाथ मंदिर, राम जानकी मंदिर, राम लक्ष्मण सीता मातेश्वरी मंदिर, राधा कृष्ण मंदिर, गणेश मंदिर, शिव मंदिर, हनुमान मंदिर, मातेश्वरी मंदिर, पुरातात्विक मूर्ति एवं लाक्षागृह के बचत अवशेष इत्यादि धार्मिक स्थल दर्शनीय स्थल है। दंतेश्वरी माता, जवारा खोल, भीम गांव, भीम चूहा, डोंगा पत्थर इत्यादि दर्शनीय एवं धार्मिक स्थल है।