व्याख्याता एल.बी. के साथ हो रहा अन्याय।

दुर्ग :- व्याख्याता एल.बी. आज भले ही संविलियन होकर नियमित हो गये है पर अभी भी काफी मानसिक व आर्थिक नुकसान झेल रहा है। लोगो की मानसिकता एल.बी.के प्रति हमेशा नकारात्मक रहा वही आर्थिक दृष्टि से भी काफी नुकसान झेल रहा है ।कारण आज तक न प्रमोशन हुआ न क्रमोन्नति मिला। कई साथी तो शुरू से बीहड़ इलाकों में कार्य कर रहे है भला इनका दुख क्यो दिखाई नही देता। जहां सेवा शर्तें इतना लचार कि कुछ भी नियम कभी बन जाये एक व्यक्ति विशेष को लाखो का वारे- न्यारे कर जाये। 1998 के शिक्षक संविलियन हुआ है वही दूसरी ओर 2006-07 में प्रमोशन होकर आये व्याख्याता एल.बी. का वेतन समान वही 2002-2003 के शिक्षक का वेतन बाद में प्रमोशन से बने व्याख्याता से वेतन कम है बड़ा ही विचित्र नियम व शर्तें है। जबकि जिस पद पर जब से काम कर रहे थे उसी आधार पर वेटेज देना था ना कि प्रथम नियुक्ति तिथि के आधार पर । यदि प्रथम नियुक्ति से वेतन निर्धारण करना था तो प्रथम नियुक्ति पद के वेतन से लागू करना था।पर ऐसा कुछ नही हुआ ठगे गये पुराने लोग। दूसरी ओर निम्न पद में रहकर परीक्षा पास कर त्याग पत्र देकर आये व्याख्याता का भी वेतन समान वही डिफरेंस राशि का भी लाखों का खेल हो गया नियम का खेल समझ से परे है। हाल ही में जब प्राचार्य प्रमोशन की बात शुरू हुआ और व्याख्याता एल.बी. से भी गोपनीय प्रतिवेदन मंगाया गया तो नियमित व्याख्याता के पेट में दर्द शुरू होने लगा और व्याख्याता एल.बी.को अपात्र बताते हुए प्रमोशन न देकर नियमित व्याख्याता को ही प्रमोशन देने की आवाज़ उठा रहे सवाल तो उस पर उठना चाहिए। कोर्ट व नियमित व्याख्याता के चलते प्रमोशन भी अधर में लटका है। सन् 1994 में व्याख्याता विरूद्ध पद पर नियुक्त फिर 1998 से शिक्षा कर्मी वर्ग 01 के पद पर 2013 में व्याख्याता (पंचायत) फिर 2018 में व्याख्याता एल.बी.के रूप मे हाईस्कूल में नियमित अध्यापन व प्रभारी व्याख्याता जो 25 से 29 वर्ष से हाईस्कूल में सेवा देने वाले भला कैसे अपात्र हुआ सवाल उठाने वाले इसका जवाब दे हमसे ज्यादा अनुभवी व पात्र भला कौन हो गया एक तरफ निजी विद्यालय में पढ़ाने वाले शिक्षक पांच साल में प्राचार्य के लिये पात्र हो जाते है तो एल.बी.क्यों नही। एल.बी.पद पर आने से नियमित पद का प्रथम वेतनमान से हमारा वेतनमान शुरू नही हुआ बल्कि प्रथम नियुक्त 1998 के आधार पर वेतनमान बढ़ते गया उसी के आधार पर व व्याख्याता(पंचायत) के दो वर्ष के आधार के पर एक-एक वेटेज जोड़कर 3 वेटेज दिया गया तो कैसे कह सकते है प्रथम नियुक्त 2018 है 2018 में 9वें लेबल से शुरू हुआ तो सात साल वैसे भी सीनियर हो गये और पांच साल अब कुल 12 साल का अनुभव वेतनमान के आधार पर हो गये है शिक्षा विभाग के आधार पर। तो भला अपात्र कैसे। जो सवाल उठा रहे है वो खुद ही युक्ति युक्तिकरण के चलते 10-12 वर्ष से हाईस्कूल में कार्य कर रहे पहले सहायक शिक्षक फिर शिक्षक और वर्तमान में व्याख्याता मे प्रमोशन होकर आये हमें अपात्र कहने से पहले हाईस्कूल में अनुभव के दृष्टि से खुद ही जूनियर है। पहले तो बहुत से सहायक शिक्षक विज्ञान हमारे अंदर प्रयोगशाला सहायक के रूप में कार्य कर रहे थे वो प्रमोशन होकर व्याख्याता गये वही आज हमें अपात्र बता रहे है।एक समय में सहायक शिक्षक पर नियुक्त हुए शिक्षकअपने आपको पात्र और 1998 से हाईस्कूल में कार्य कर रहे शिक्षक अपात्र मानना छोटे सोच को दर्शाता है।एक ओर जो शिक्षक कभी हाईस्कूल में कार्य नही किये है और न ही हाईस्कूल के कार्य को जानते है पूर्व माध्य शाला के प्रधान पाठक को सीधे व्याख्याता बनाने के बजाय सीधे प्राचार्य बनाना भी समझ से परे है जिसे हाईस्कूल का अनुभव ही नही है वो पात्र है जो बरसों से कार्य कर रहे है उसे अपात्र बता रहे है।जिसने अपने अनुभव व कुशल दायित्व निर्वाहन करते हुए हाईस्कूल का स्तर को बेहतर बनाया है अभी तक कोई भी प्रमोशन नही मिला शुरू से उसी जगह कार्य कर सेवानिवृत्त के कगार पर है वो आज लोगो को अपात्र दिख रहा है।
शासन को चाहिए कि जितने नियमित है उसे अलग स्कूल में पदस्थापना कर दे और जितने एल.बी. है उसे अलग स्कूल में पदस्थापना कर दे और फिर देखे कौन ज्यादा अनुभवी व पात्र है और कौन अपात्र।जब तक एल.बी. कैडर रहेगा तब तक यह समस्या रहेगी इसलिए इसको हटाकर सभी को एक मानते हुए पहले हाईस्कूल में जो पदस्थापना को देखते हुए वरीयता बनाये जाये तब कही यह समस्या हल हो पायेगा सभी का प्रथम नियुक्त तिथि के आधार पर वरीयता दी जाये संविलियन तो एक व्यवस्था है ना की नई नियुक्ति जिसे आधार बनाये ।

शिवनारायण देवांगन “आस”
व्याख्याता एल.बी.
शास.उच्च.माध्य.शाला अंजोरा(ख) दुर्ग
मो.9981763747 #7067370013