रविवारीय प्रेरक लघुकथा में आपका स्वागत है l 

लघुकथा
श्रद्धा और समर्पण

एक गाय घास चरने के लिए जंगल में चली गई । शाम ढलने के करीब थी उसने देखा कि एक बाघ उसकी तरफ दबे पाव बढ़ रहा है। वह डर के मारे इधर-उधर भागने लगी । बाघ उनके पीछे दौड़ने लगा। दौड़ते हुए गाय को सामने एक तलाब दिखाई दिया घबराई हुई गाय उस तालाब के अंदर घुस गई। वह बाघ भी उसका पीछा करते हुए तालाब के अंदर घुस गया । तब उन्होंने देखा कि वह तालाब बहुत गहरा नहीं था उसमें पानी कम था और कीचड़ से भरा हुआ था। उन दोनों की बीच की दूरी काफी कम थी। लेकिन अब बाघ कुछ नहीं कर पा रहा था। गाय कीचड़ के अंदर धीरे-धीरे धंसने लगी। बाघ भी उनके पास होते हुए भी उसे पकड़ नहीं पा रहा था।
गाय ने उससे पूछा, “क्या तुम्हारा कोई गुरु है या मालिक है ?”
बाघ ने गरजते हुए कहा, “मैं तो जंगल का राजा हूं मेरा कोई मालिक नहीं, मैं खुद ही जंगल का मालिक हूं।”
“लेकिन तुम्हारे उस शक्ति का यहां पर क्या उपयोग है।”
उस बाघ ने कहा,” तुम भी तो फस गई हो और मरने के करीब में हो। तुम्हारी भी तो हालत मेरी जैसी है।”
गाय मुस्कुराती हुई बोली, “बिल्कुल नहीं! मेरा मालिक जब शाम को घर आएगा और मुझे वहां पर नहीं पाएगा तो वह ढूंढते हुए यहां जरूर आएगा। और मुझे इस कीचड़ से निकाल कर अपने घर ले जायेगा । तुम्हें कौन ले जायेगा?”
थोड़ी देर में गाय का मालिक आया और गाय को कीचड़ से निकालकर अपने घर ले गया । जाते समय गाय और उनका मालिक दोनों एक दूसरे के प्रति कृतज्ञता पूर्वक देख रहे थे। वे चाहते हुए भी उस बाघ को कीचड़ से नहीं निकाल सकते थे क्योंकि उनकी जान के लिए वह खतरा था।
शिक्षा- गाय समर्पित हृदय का प्रतीक है ।बाघ अहंकारी मन है और मालिक सद्गुरु का प्रतीक है। कीचड़ यह संसार है, इससे उबरने वाले सद्गुरु ही हैं।

दिनेंद्र दास
कबीर आश्रम करहीभदर अध्यक्ष मधुर साहित्य परिषद् तहसील इकाई बालोद, जिला- बालोद छत्तीसगढ़