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हो सकता है,,
बिडला व्हाइट सीमेंट से,
दीवारें बोल उठे|
लेकिन रिश्तों को जिंदा,
रखने के लिए,
खुद को बोलना पड़ता है||
हो सकता है,,
सर्फ एक्सल और रिन से,
जिद्दी दाग धूल जाए|
पर चरित्र पर लगे दाग,
किसी भी डिटरजेंट से नहीं धुलता|
हो सकता है,,
बबूल और क्लोजअप से,
दाँतों में चमक आ भी जाए|
किंतु जिंदगी में चमक,
बच्चों को दिए संस्कार से आती है||
हो सकता है,,
फ़ार्चुन और धारा तेल से,
दिल सेहतमंद बन भी जाए,
किंतु गृहस्थी की सेहत के लिए,
श्रद्धा और विश्वास की निर्मल,
धारा बहाना जरूरी होता है||
इस विज्ञापन और बाजार की,
दौर में हर सामान बिकता है
शोहरत की बुलंदी में पहुंचकर,
अच्छे अच्छों का ईमान डिगता है||
विज्ञापन में दिखाई हर चीज,
किफ़ायती हो यह जरूरी नहीं है,
अन्यथा सीप में छुपे मोती,
और कचरे में दबे हीरे कभी भी,
बेशकीमती नहीं होते–
बल्कि औरों से,
ये अनमोल इसलिए है क्योंकि,
इसके जिस्म की कभी भी,
खुलेआम नुमाइश नहीं होती,
किसी बाजारु की तरह–
रचनाकार:-श्रवण कुमार साहू,”प्रखर “
शिक्षक/साहित्यकार राजिम, गरियाबंद
