प्रकृति ह कामधेनु हरे—-


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जब तक काटबे तै रुख ल,
नंगत भोगे ल पड़हि दुख ल।
आज तै जतके बोहाबे पानी,
संकट म पड़हि जिनगानी||

डिस्पोजल के बढ़ाबे कचरा,
वोतके बाढ़ही तोर लफड़ा||
जतेक निकलही,करखाना ले गैस,
वोतके बाढ़ही खाँसी,दमा के केस||

तै जतके जलाबे पेट्रोल डीजल|
तोर जिनगी होहि अकल-बकल||
आज जतके बिजली ल खपाबे|
तैहा पाछु म वोतके पछताबे||

कोनों आज ईंधन नइ बचाबे ,
त काली कामे खाना बनाबे||
खेत म झन डार खातू दवई,
बंजर होहि त,तोर होहि रोवई|

ध्वनि प्रदूषण झन करव,
भैरा,अंधवा,बन झन मरव|
प्रकृति ह सबके माता ये,
बेटी जान के सिंगार करव||

जतेक अकन लिखे हों,
वोमा बड़े-बड़े बात हे|
दुनिया के नाश करे म,
फकत हमरे मन के हाथ हे||

अपन सुख के खातिर संगी,
प्रकृति के झन संहार करो|
प्रकृति ह कामधेनु हरे,
एकर संग सही बेवहार करो||
रचनाकार:-श्रवण कुमार साहू, “प्रखर”
शिक्षक/साहित्यकार,राजिम,गरियाबंद(छ.ग.)