नशा

नशा

किसी को शराब पीने का नशा है,
दर्द और ‌गम को भुलाने के लिए।
किसी को मांस खाने का नशा है,
मूक जानवरों को मारने के लिए।।

किसी को दौलत पाने का नशा है,
व्यापार को अधिक बढ़ाने के लिए।
किसी को भ्रष्टता करने का नशा है,
गरीबों को बहुत सताने के लिए।।

किसी को प्यार करने का नशा है,
अपनी प्रेमिका को पाने के लिए।
किसी को अर्धांगिनी का नशा है,
जीवन में आनंद लाने के लिए।।

किसी को विजय पाने का नशा है,
सपनों की मंजिल में जाने के लिए।
किसी को पदवी का बहुत नशा है,
विश्व में सबसे बड़ा बनने के लिए।।

नशा हद में सीमित है तब तो ठीक है,
असीमित होने पर मनुष्य है जानवर।
चढ़ा नशा एक दिन सबका उतरेगा,
काल को होगी आत्मा का न्योछावर।।

कवि- अशोक कुमार यादव मुंगेली, छत्तीसगढ़
जिलाध्यक्ष राष्ट्रीय कवि संगम इकाई।