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क्या तुम मेरा कोई इतिहास लिख सकते हो|
सर्वहारा वर्ग में,मुझे खास लिख सकते हो||
फटे कपडे़ तंग जिंदगी,टूटा आवास लिखना|
गर्दिशों में जीता हुआ,इंसान खास लिखना||
मेरे नाम यह धरती और,नील गगन लिखना|
लिख सको तो बाग-बगीचा,चमन लिखना||
क्या मुझ पर गरीबी की मार लिख सकते हो-
लिख सको तो लाल किला,और ताज लिखना|
दम तोड़ती जिंदगी,सिसकती आवाज़ लिखना||
मेरे हिस्से में अनवरत जारी,शीत युद्ध लिखना|
क्रोधी हूँ परशुराम सा,पर मौनव्रती बुद्ध लिखना||
बोलो मेरे सीने की धधकती आग लिख सकते हो-
इतिहास के पन्नों पर,तुम मुझको ग़ुलाम लिखना|
युद्ध में शहीद हुए,कोई योद्धा गुमनाम लिखना||
समाज को झकझोर दे,कुछ ऐसा पैग़ाम लिखना|
हो सके तो हर तन्हाई को,तुम मेरे नाम लिखना||
बोलो क्या तुम मुझे अपने साथ लिख सकते हो–
दुनिया के नवनिर्माण में,कहाँ मेरा किस्सा नहीं|
सुख के अधिकार पर,बोलो मेरा क्यूँ हिस्सा नहीं||
अपनी दर्द भरी जिंदगी में,मशहूर मत लिखना||
मजदूर है साहब!बेबस और मजबूर मत लिखना|
मेरे इस जीवन से,क्या तुम कुछ सीख सकते हो-
रचनाकार:-श्रवण कुमार साहू, “प्रखर”
शिक्षक/साहित्यकार, राजिम, गरियाबंद (छ.ग.)
