रामचंद्र चौमासा राजिम में रुककर आसुरी शक्तियों का किया नाश।

रिपोर्टर संतोष सोनकर

राजिम:- धर्म नगरी राजिम का संबंध त्रेतायुग में भगवान रामचंद्र से जुड़ा हुआ है। वनवास काल के दौरान नदी मार्ग से होते हुए सीधे महर्षि लोमश से मिलने प्रयाग भूमि राजिम पहुंचे। उस समय देवी सीता, छोटे भाई लक्ष्मण के साथ प्रभु श्रीरामचंद्र स्वयं आकर महर्षि लोमश का दर्शन किया पश्चात चौमासा रुककर यहां उपस्थित आसुरी शक्तियों का समूल नाश किया इस बात का उल्लेख डॉक्टर मन्नुलाल यदु ने अपने शोध ग्रंथ में उल्लेख किया है। इस संबंध में कथानक है कि देवी सीता प्रतिदिन त्रिवेणी संगम में स्नान करती थी। उन्होंने अपने कुल के देवता महादेव की पूजन अर्चन करने की इच्छा प्रकट की और स्नान पश्चात अपने हाथों से बालू लेकर देखते ही देखते शिवलिंग का निर्माण कर लिया। अपने पास रखे पात्र से जलाभिषेक किया जल धारा 5 और से बहने लगा और इस तरह से इस शिवलिंग को पंचमुखी नाम दिया गया। कुल के देवता की आराधना के लिए उन्होंने शिवलिंग रेत से बनाया इसलिए इनका नाम कुलेश्वरनाथ महादेव हुआ। कालांतर में जगती तल का निर्माण किया गया। यह शिवलिंग आज भी मौजूद है। रामायण काल में दो मुख्य नायक एवं नायिका में रामचंद्र ने दक्षिण भारत के रामेश्वरम में रामेश्वरम महादेव की स्थापना किया तो देवी सीता ने प्रयाग भूमि राजिम में कुलेश्वर नाथ महादेव का निर्माण किया। नर और नारायण के द्वारा महादेव की स्थापना अपने आप में श्रद्धा भक्ति एवं विश्वास को जन्म देती है। बताया जाता है कि राजिम नगरी का अस्तित्व अत्यंत प्राचीन है इतिहासकारों के अनुसार इन्हें तीसरी चौथी शताब्दी का माना गया है। यहां हुए खुदाई के अनुसार सीताबाड़ी में अत्यंत प्राचीन मकान से लेकर गली तथा उपयोग किए जाने वाले बर्तन इत्यादि मिले हुए हैं खुदाई के द्वारा अनेक ऐसे वस्तुएं उपलब्ध हुए हैं जिससे छत्तीसगढ़ के इतिहास प्रगाढ़ होते हैं।

मौजूद है लोमस ऋषि आश्रम-लोमस ऋषि आश्रम आज भी मौजूद है वर्तमान में नदी के पश्चिम दिशा की ओर धमतरी जिला के आखिरी छोर पर लोमस ऋषि का आश्रम मौजूद है वर्तमान चकाचौंध से दूर यहां सिर्फ वृक्षों का झुरमुट था परंतु धीरे-धीरे अनेक मकान एवं मंदिर यहां निर्मित हो चुके हैं। मंदिरों की अधिकता हो गई है जिसके कारण वृक्षों की संख्या कम दिखाई देती है चूंकि लोमस ऋषि ब्रह्मर्षि माना गया है। धर्म शास्त्रों में इन्हें आज भी जीवित होने के प्रमाण समय-समय पर देखे जाते हैं कई श्रद्धालु कर बताते हैं कि लोमस ऋषि त्रिवेणी संगम में स्नान करने के लिए प्रतिदिन आते हैं कई भक्तों ने उनके पांव के निशान देखे हैं। जिस बात की चर्चा होती रहती है। उल्लेख मिलता है कि लोमस ऋषि बचपन में बहुत डरते थे उनके डर को दूर करने के लिए नारद ऋषि ने ब्रह्मा के तपस्या करने के लिए कहा उन्होंने लगातार तप किया। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने उन्हें वरदान दिया कि जब तक तुम्हारे शरीर के रोम पूरी तरह से गिर ना जाए तब तक तुम अमर रहोगे। तब से लेकर लोमस ऋषि को लोग आज भी जीवित मानते हैं।

रामचंद्र की 21 फीट ऊंची प्रतिमा-राम वन गमन पथ के अंतर्गत छत्तीसगढ़ सरकार ने महोत्सव मंच के पास विशाल आकार में 21 फीट ऊंची रामचंद्र के प्रतिमा का निर्माण किया है। उड़ीसा के कारीगरों ने गेरुआ पत्थर से आकर्षक लुक दिया है। ऊंचे चबूतरा पर यह प्रतिमा स्थापित है। इसी वर्ष 7 जनवरी राजिम भक्तिन माता जयंती के अवसर पर प्रदेश के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इस मूर्ति का अनावरण किया। तब से लेकर बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचकर भगवान रामचंद्र जी के प्रति श्रद्धा सुमन समर्पित करते हैं। भगवान रामचंद्र के प्रति लोगों की श्रद्धा कूट-कूट कर भरी हुई है।