राजिम 28 मार्च। शहर के चौबेबांधा मार्ग पर स्थित आदिशक्ति देवी सत्ती का दरबार श्रद्धालुओं के लिए हमेशा खुला रहता है। प्रतिदिन पूजन आरती के साथ ही माहौल भक्तिमय है। वर्ष के दोनों नवरात्र पर्व में बड़ी संख्या में ज्योति कलश जलाई जाती है। शहर में प्रवेश करते ही तालाब का दर्शन होता है और इन्हीं के तट पर देवी सत्ती शीला रूप में विराजमान होकर श्रद्धालुओं की हर मुराद पूरी कर रही है।
आज से 20 साल पहले यह स्थल यदा-कदा पड़ा हुआ था तब मात्र ईट का एक छोटा सा मंदिर विद्यमान था जिसमें देवी सत्ती शीला रूप में मौजूद थे। तब लोग बड़ी दिक्कत में फंस जाते थे कहीं से उनको उबरने का रास्ता नहीं मिलता था तब थक हारकर देवी मां की शरण में आते और जोड़ा नारियल चढ़ाकर मनौती मांगते थे और देवी मां प्रसन्न होकर अपने बेटे बेटियों पर कृपा बरसाती थी। लोग इनकी महिमा का हमेशा बखान करते थे और पूरे क्षेत्र में उदाहरण बन गया था लेकिन मंदिर का जीर्णोद्धार एवं रखरखाव नहीं हो पा रहा था। शहर के कुछ युवाओं ने गहरा चिंतन किया और ऐसे स्थल को आकर्षक लुक देने के उद्देश्य से ज्योति कक्ष के साथ ही छोटे मंदिर के ऊपर से बड़ा कमरा बनाया और माता के स्वरूप को मनमोहिनी आकार दिया गया तब से लेकर पिछले 20 सालों से लगातार ज्योति कलश प्रज्वलित हो रही है और अब तो इस स्थल को संवारने के लिए मंदिर समिति का निर्माण भी किया गया है जिनके द्वारा हनुमान का अलग से मूर्ति स्थापित किया गया है। सामने ही वट वृक्ष है। तुलसीकृत रामायण में देवी सत्ती का संबंध राजा दक्ष की पुत्री तथा महादेव के धर्मपत्नी के रूप में वर्णन आता है। एक समय महाराज दक्ष ने ब्रहस्पतिसव यज्ञ का आयोजन करवाया। इस समारोह में देश देश के राजा महाराजा के अलावा देव ऋषि मुनि नाग किन्नर यक्ष सभी को आमंत्रित किया। द्वेषवश भोलेनाथ को छोड़ दिया परंतु देवी सती का मन नहीं माना और पति से जीद कर यज्ञ समारोह में पहुंच गया परंतु वहां भोलेनाथ का कोई स्थान नहीं देख कर अपने आप को अपमानित महसूस करते हुए सत्ती ने योगा अग्नि में समाप्त कर दी। भोलेनाथ सती के शव को लेकर इधर-उधर भटकते रहे तब विष्णु जी ने चक्र सुदर्शन से सती के देह के टुकड़े टुकड़े किए और जहां-जहां यह हिस्सा गिरा वह शक्ति पीठ कहलाएं। इन्हीं देवी सती की प्रतिकृति तथा ग्रामीण देवी के रूप में इनकी प्रतिष्ठा वर्षों से है। प्रतिदिन होने वाले पूजन आरती तथा देवी जस गीत से माहौल हमेशा भक्ति में है।
कमलक्षेत्र में है अनेक देवी मंदिर
राजिम का प्राचीन नाम कमल क्षेत्र हैं। समय के साथ साथ इनका नाम बदला और फिर यह पद्मावती पूरी कहलाने लगा। देवपुरी, छोटा काशी, राजीव नगर पंचकोशी धाम इत्यादि नामों से इन्हें अलंकृत किया गया यहां प्रमुख रूप से कमल क्षेत्र के आराध्य देवी के रूप में मां महामाया विराजमान है। संगम के किनारे प्राचीन शीतला मंदिर, कुलेश्वर नाथ महादेव मंदिर के द्वितीय प्रांगण पर दुर्गा माता मंदिर, मां महामाया मंदिर से 200 गज की दूरी पर देवी चंडी मंदिर, ब्रह्मचारिणी दरबार, तुलजा भवानी मंदिर इत्यादि है। इन दैवीय स्थल पर प्रति नवरात्र पर्व ज्योति कलश प्रचलित की जाती है और माहौल भक्तिमय बना रहता है।
सती मंदिर से लगा है पदमा सरोवर
देवी सती मंदिर पहुंचने के रास्ते पर ही तकरीबन 400 गज की दूरी पर पदमा सरोवर है इस सरोवर को सतयुग में राजा रत्नाकर के द्वारा किए गए यज्ञ का यज्ञ कुंड माना गया है। पंचकोशी यात्रा यात्रा पूर्ण कर वापस आते हैं तब इस सरोवर में स्नान करते हैं उसके बाद ही त्रिवेणी संगम में स्नान के लिए पहुंचते हैं और कुलेश्वर नाथ महादेव की पूजन आराधना कर यात्रा का समापन करते हैं।
