
छुरा :- ऐसे तो सरकार और प्रशासन द्वारा दिव्यांगों के लिए कई योजनाएं संचालित की जाती है और दिव्यांगों को पहले प्राथमिकता दी जाने की बात कही जाती है लेकिन धरातल पर देखें तो आज भी कई दिव्यांग भाई बहन योजनाओं से वंचित भटकते नजर आते हैं। और हम सभी की जिम्मेदारी होती है कि उन्हें हम अपने स्तर पर जो मदद और सहयोग बन सके ओ करें।
हम बात करते हैं गरियाबंद जिले के विकासखंड छुरा के ग्राम पंचायत मेड़कीडबरी के सुरंगपानी निवासी बिसाहू राम यादव की, जो एक पैर से बचपन से दिव्यांग हैं और न ही उनके बाप हैं बल्कि एक पत्नी और दो छोटे बच्चे हैं उनके बच्चे पढ़ाई करने सरकारी स्कूल जाते हैं और पत्नी गांव के स्कुल में स्वीपर का काम करती है, उनके पास अपनी खेती बाड़ी के लिए कोई जमीन भी नहीं है। पत्नी की मजदूरी और राशनकार्ड के चावल और बिसाहू राम के पेंशन के 350/ रूपये से घर का गुजारा होता है। लेकिन उनका मुख्य समस्या था रहने के लिए घर, पिछले कई सालों से वे एक झोपड़ीनुमा एक कमरे में रहकर गुजारा करते थे और वहीं खाना बनाना,सोना,रहना करते थे, कई वर्षों तक सरकार के आवास योजना का लाभ मिलने का इंतजार करते रहे लेकिन उसे आवास योजना का लाभ नहीं मिल पाया। बच्चे थोड़ा बड़े होने लगे तो उनके पड़ने लिखने व रहने की चिंता बिसाहू राम को सताने लगी तो उन्होंने मजबूरी में बिहान महिला समुह से ऋण लेकर एक कमरे ईंट का निर्माण कर उसमें सीमेंट का चादर लगवाया है अभी छबाई भी नहीं कर पाया है। जब हमारे संवाददाता ने उनसे बात करते हुए पुछा गया कि आप ये ऋण किस प्रकार हर महीने पटा पायेंगे तो उन्होंने रूंधे आवाज से कहा कि महुआ बीनकर, तेंदुपत्ता तोड़कर जैसे भी अपने खर्च में कटौती कर पटाना तो पड़ेगा सर, कभी पैसा कम रहता है तो ब्याज की राशि भर पटाते हैं और कभी पैसा हो जाता है तो मूल राशि भी पटाते हैं महिला समूह के दीदीयां भी हमारी स्थिति को देखकर कुछ ज्यादा नहीं बोलते हैं और महिला समूह में मेरे पत्नी कृषि सखी का काम करते हैं तो कोई महीने वहां से जो मेहनताना मिलता है उसे ही पटाते हैं क्योंकि मैं तो एक पैर से दिव्यांग हूं तो लाठी टेककर थोड़ा बहुत इधर उधर मेरे लायक काम करता हूँ और घर की सारी जिम्मेदारी मेरी पत्नी के ऊपर रहता है वही काम करती है तो घर चल पाता है द़ो बच्चे हैं वे छोटे हैं अभी काम करने लायक नहीं हैं वे अभी गांव के स्कूल में पढ़ाई करने जाते हैं। जब वन पट्टे के बारे पुछे जाने पर बताया कि मै तो दिव्यांग हूं, कौन जंगल साफकर खेती के लिए जमीन बनाता, पत्नी को हमारे पेट भरने के लिए काम करना पड़ता है इसलिए उन्हें समय ही नहीं मिलता इसलिए कहीं हम जमीन ही नहीं बना पाये और वन अधिकार पट्टे की योजना से भी हम वंचित हैं आज तक जब किसी जमीन पर काबिज ही नहीं हैं तो किस प्रकार आवेदन प्रशासन को करेंगे कहते हुए बिसाहू राम अपने नसीब को कोसते हुए कहा कि सर ऊपर वाले ने मुझे दिव्यांग के रूप में पैदा किया है तो इतने दिन जैसे कटा आगे और भी कटेगा, मै इतना शारिरिक रूप से सक्षम भी नहीं हूँ कि प्रशासन से मदद के लिए भागदौड़ कर सकूं। मेरे बच्चे जब बड़े होंगे तो मुझे इन तकलीफों से शायद निजात मिल पायेगा और मै अपने बच्चों को पढ़ाने का प्रयास करूंगा शायद ओ मुझसे अच्छा बन सकें। उनका कहना था कि मेरे और परिवार का गुजारा तो जैसे तैसे मजदूरी कर गुजर तो रहा था लेकिन शासन प्रशासन द्वारा हम जैसे दिव्यांगों को प्राथमिकता देते हुए आवास योजना का लाभ मिल पाता तो मुझे ऋण लेकर एक कमरे बनाने की आवश्यकता नहीं होती और न मुझे कर्ज तले दबकर परेशानी उठानी नहीं पड़ती, ये कहते हुए उन्होंने बिहान के महिला दीदीयों का धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कहा कि उनके सहयोग से मुझे ऋण उपलब्ध हुआ और अब कम से कम मुझे और मेरे परिवार को बारिश के दिनों में पानी टपकने के कारण रात भर जगना तो नहीं पड़ेगा।
