झीरम कांड: दस साल से जेल में बंद मनकेली के तीन ग्रामीणों को फांसी की सजा, परिजनों ने सरकार से लगाई राहत की गुहार
मनकेली सरपंच कमला कोरसा बोलीं—नक्सलवाद के दौर की मजबूरियों को समझे सरकार, NIA अपने फैसले पर करे पुनर्विचार
परिजनों का आरोप—बड़े नक्सली आराम की जिंदगी जी रहे, छोटे कैडर वर्षों से जेल में भुगत रहे सजा
ईश्वर सोनी बीजापुर
झीरम घाटी हमले के मामले में विशेष NIA अदालत द्वारा सुनाई गई मृत्युदंड की सजा के बाद बीजापुर जिले में इस फैसले को लेकर ग्रामीणों और परिजनों ने सरकार से पुनर्विचार की मांग की है
मनकेली पंचायत की सरपंच कमला कोरसा के नेतृत्व में ग्रामीणों और परिजनों ने मीडिया से मुलाकात कर अपनी पीड़ा सामने रखी
परिजनों के अनुसार, सुमित्रा मोडियाम निवासी मनकेली, चेतु लेकाम निवासी मुनगा और प्रमिला मोडियाम निवासी गोरना करीब दस वर्षों से जेल में बंद हैं और झीरम मामले में विशेष NIA अदालत ने उन्हें फांसी की सजा सुनाई है।
सरपंच कमला कोरसा सहित परिजनों ने कहा कि जिस दौर में बस्तर में नक्सलवाद का प्रभाव बेहद ज्यादा था, उस समय ग्रामीणों के सामने भय, दबाव और मजबूरी की परिस्थितियां थीं , उन्होंने सरकार और NIA से अपील करते हुए कहा कि उस समय की परिस्थितियों, आरोपियों की भूमिका और पूरे मामले के मानवीय पहलुओं को ध्यान में रखते हुए फैसले पर पुनर्विचार किया जाए।
” घटना के जिम्मेदार बड़े नक्सली ऐश की जिंदगी जी रहे, छोटे कैडर जेल में”
परिजनों ने गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि “जिन बड़े नक्सलियों के दबाव में ग्रामीण संगठन के साथ रहने को मजबूर थे, उनमें से कई आज आत्मसमर्पण के बाद अधिकारियों और नेताओं के साथ तस्वीरें खिंचवा रहे हैं और आराम की जिंदगी जी रहे हैं। दूसरी ओर, छोटे कैडर और ग्रामीण, जो परिस्थितियों के चलते उनके साथ रहे, वे वर्षों से जेल में बंद हैं।”
परिजनों का कहना है कि जेल में बंद लोगों से मिलने के लिए परिवारों को बार-बार बीजापुर से दंतेवाड़ा और जगदलपुर तक जाना पड़ता है , हर मुलाकात में आने-जाने और अन्य खर्चों के कारण परिवारों पर आर्थिक बोझ पड़ रहा है
उन्होंने बताया कि हर पेशी पर वकीलों को करीब 2 हजार से 10 हजार रुपये तक देने पड़ते हैं , लगातार कोर्ट और जेल के चक्कर लगाते-लगाते परिवार आर्थिक और मानसिक रूप से परेशान हो चुके हैं , परिजनों का कहना है कि वर्षों से चली आ रही इस प्रक्रिया ने उनके परिवारों को बेहद कठिन परिस्थितियों में पहुंचा दिया है
“एक बार सरकार और NIA फैसले पर विचार करे”
परिजनों ने सरकार से भावुक अपील करते हुए कहा कि “हम कोर्ट और जेल के चक्कर लगाते-लगाते हर स्थिति से टूट चुके हैं। हमारे परिवार बेहाली की जिंदगी जी रहे हैं। सरकार और NIA एक बार अपने फैसले पर विचार करें और सजा में राहत दें।”
परिजनों ने यह भी कहा कि यदि उनकी मांग पर सरकार ने विचार नहीं किया तो वे रायपुर – जगदलपुर पहुंचकर विरोध-प्रदर्शन करने पर मजबूर होंगे
हालांकि झीरम घाटी हमला एक गंभीर और घातक नक्सली हमला था, परिजनों का कहना है कि प्रत्येक आरोपी की व्यक्तिगत भूमिका, तत्कालीन परिस्थितियों और मामले में उसकी वास्तविक भागीदारी को अलग-अलग देखते हुए सजा पर पुनर्विचार होना चाहिए। उनका दावा है कि जिन लोगों को फांसी की सजा सुनाई गई है, उनमें कुछ लोग परिस्थितियोंवश नक्सली संगठन के संपर्क में आए थे।
इस दौरान सरपंच कमला कोरसा, परिजन चमरू मोडियाम, मुन्ना मोडियाम, सुभाष लेकाम, चमरू कुरसम, लकमी कोरसा, सोमली हेमला सहित सैकड़ों ग्रामीण मौजूद रहे
परिजनों की मांग है कि लंबे समय से जेल में बंद तीनों ग्रामीणों के मामले में सरकार और संबंधित न्यायिक प्रक्रिया के तहत उपलब्ध कानूनी विकल्पों पर पुनर्विचार किया जाए और उन्हें राहत दी जाए।
झीरमकाण्ड के चश्मदीद पूर्व कांग्रेसी नेता अजयसिंह ने कहा NIA का फैसला आधा – अधूरा
झीरम कांड के चश्मदीद पूर्व कांग्रेसी नेता ने अजय सिंह ने भी NIA कोर्ट के फैसले को हैरान कर देने वाला बताया उन्होंने कहा कि जिनको आरोपी बताकर फांसी दी गई है उनमें कोई बड़ा नक्सली नही है जो घटना के मास्टर माइंड थे वो आज समर्पण भी कर चुके है एंव घटना में शामिल होना स्वीकार भी कर चुके है फिर उनको रिहायत क्यो दी जा रही है एंव इन छोटे कैडर के नक्सलियों को सालो से जेल में बन्द रहने व सजा भुगतने के बाद फांसी की सजा देना उचित नही है सरकार एंव कोर्ट एक बार पुर्नविचार करें।
