विचार :-
युवायें , कुण्ठित क्यों हो रहे हैं ?
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अति सर्वत्र वर्जयेत की उक्ति बिलकुल सत्य बात है । जब देश में काफी कम संख्या में लोग पढ़े – लिखे थे , तो उस समय पाँचवी – आठवी पास व्यक्तियों को सरकारी नौकरी मिल जाता था । देश में जब शिक्षा का विस्तार करके सबके लिए शिक्षा कर दिया गया तो पढ़े – लिखे लोगों की संख्या , सरकारी नौकरी के लिए आवश्यकता से हजारों गुने अधिक संख्या में लोग हो गए । अब तो स्थिति ये हो गयी है कि पाँचवी – आठवी पढ़े – लिखे लोग निरक्षर जैसे ही लगते हैं । उच्च शिक्षित लोग भी चपरासी की नौकरी करने के लिए बेताब रहते हैं । बेरोजगारी की यही स्थिति युवाओं को कुंठाग्रस्त किये जा रही है । मेरी राय से लोग सहमत नहीं होंगे लेकिन अनपढ़ होकर भूखे मरना और पढ़ – लिखकर भूखों मरना में अनपढ़ होकर भूखे मरने की स्थिति अधिक सुखदायक होती है । पढ़े – लिखे कुंठाग्रस्त लोग अधिक दुखी होते हैं बजाय अनपढ़ लोगों के ।
शिक्षा यदि अच्छी हो तो आदमी को निकृष्ट से उत्कृष्ट बना सकती है । शिक्षित मनुष्य हरेक दुखों के पलों को सुख में बदल सकता है लेकिन यदि शिक्षा उपयुक्त न हो तो वैसी शिक्षा सिवाय बोझ के कुछ भी नहीं है । आधुनिक शिक्षा की स्थिति लगभग ऐसी ही है । आधुनिक शिक्षा का उद्देश्य जीवन स्तर को उठाना या सुधार करना नहीं है बल्कि इसका उद्देश्य सरकारी सेवा हासिल करना होता है । पढ़ – लिखकर जो सरकारी सेवा या अन्य कहीं भी अच्छे से कोई रोजगार या पद हासिल कर लिए उनके लिए ये आधुनिक शिक्षा ही वरदान है लेकिन जो व्यक्ति , आधुनिक शिक्षा के सहारे कुछ हासिल न कर सका उनके लिए यह शिक्षा फूटी कौड़ी काम के नहीं है । आधुनिक शिक्षा में इलेक्ट्रॉन , प्रोटॉन , न्यूट्रॉन , कोशिका , भूगोल , विज्ञान , अवकलन , समाकलन आदि पढ़ाया – सिखाया जाता है । यदि कोई युवा को रोजगार नहीं मिल पाता है तो ये इलेक्ट्रॉन , प्रोटॉन का ज्ञान उनके जीवन में कोई सहायता नहीं कर सकता है । दुनियाँ में व्यवस्था चाहे कैसी भी रहे , लोकतान्त्रिक रहे या तानाशाही रहे ; उस लोकजीवन में लाभ ले रहे व्यक्तियों के लिए हरेक प्रकार की व्यवस्था वरदान ही होती है लेकिन योग्य होकर लाभ से वंचित हो जाने वालों के लिए वही व्यवस्था अभिशाप साबित हो जाती है ।
आज युवा वर्ग सरकारी नौकरी की चाह में अपने जीवन के महत्वपूर्ण पच्चीस – सत्ताईस वर्षों को और साथ में माता – पिता की कमाई धन को भी पढ़ाई – लिखाई में खर्च कर रहे हैं लेकिन अधिकांश को रोजगार नहीं मिल पा रहा है । इससे कुछ माता – पिता अपने बच्चों पर खीझ उतार देते है , इससे युवा मन में तनाव पैदा हो जाता है । दूसरा कारण आरक्षण की व्यवस्था भी तनाव का कारण बन रहा है कि अन्य वर्ग के लोग उससे काफी कम अंक पाकर भी सरकारी सेवा के योग्य कैसे हो गए । तीसरा कारण सरकारी सेवा में मोटा वेतन का होना , बेरोजगार आदमी अपनी आय और सरकारी सेवकों की आय की तुलना करता है । बेरोजगार आदमी , घर से धन लगाकर कोई स्वरोजगार करने की हिम्मत ठीक से जुटा नहीं पाता है क्योंकि कोई भी व्यवसाय की कोई गारंटी नहीं होती है कि वह चल निकले ; कुछ लोगों के पास खुद के व्यवसाय करने लायक धन नहीं होता और बैंक से कर्ज लेकर व्यवसाय करने में बहुत जोखिम भरा रहता है क्योंकि व्यवसाय के डूब जाने की स्थिति में बचे – खुचे धन के भी लूट जाने का खतरा रहता है । समाज के लोगों के द्वारा दिए जाने वाले तानों के कारण भी युवाएँ कुंठित होते हैं , लोग उदाहरण देने लगते हैं कि अमुक आदमी इतना पढ़ा – लिखा लेकिन कोई काम का नहीं रहा बल्कि माँ – बाप की कमाई को फूँक डाला । समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार भी युवाओं के कुंठा के प्रमुख कारण है – ऐसे युवा जो कमजोर है लेकिन उसके नाते – रिश्तेदार के लोग आर्थिक रूप से सक्षम है और ऊपर तक पहुँच भी है तो उनको सरकारी सेवा का लाभ पहले मिलता है परंतु आर्थिक रूप से कमजोर योग्य युवाओं को लाभ से वंचित हो जाना पड़ता है । कम्प्यूटरीकृत युग के कारण रोजगार के अवसरों का सिमटना भी कुंठा का एक कारण है । किसी को ऐसा कभी भी नहीं कहना चाहिए कि उसने मेहनत ठीक से नहीं की , जब पद सिर्फ एक है और उनके दावेदार सौ हैं तो चाहे मेहनत कैसे भी क्यों ना कर ले , उनमें से निन्यानबे को बाहर होना ही पड़ेगा ।
चूँकि रोजगार का सृजन , युवाओं की माँग के अनुरूप कर पाना सम्भव नहीं है तो उच्च शिक्षा का अधिक विस्तार करके पढ़े – लिखे बेरोजगार पैदा न किये जाएँ । इससे दो फायदे होंगे — पहला तो यह कि राजकोषीय व्यय सीमित होंगे और दूसरा फायदा युवाओं को कुंठा से बचाने में मदद मिलेगी । नए उच्च शिक्षण संस्थान खोलने से यदि तीस लोगों को रोजगार मिलता है तो वही तीस मिलकर तीस हजार नए बेरोजगारों को जन्म भी देता है ।

प्रेमसागर कश्यप
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