कीचड़ रूपी संसार से बेदाग निकलना भगवत भक्ति से ही संभव : भागीरथी महाराज।

दशहरा मैदान में चल रहा श्रीमद् भागवत महापुराण।

प्रमोद दुबे 

महासमुंद – गज मोक्ष की कथा श्रवण करने से मनुष्य देवऋण, गुरू ऋण और पितृव ऋण से मुक्त होता है। मनुष्य जन्म लेते ही इस तीनों ऋण से लद जाता है और पुरा जीवन इसे उतारने में लगा रहता है। फिर भी इससे वह उबर नहीं पाता।

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माताएं को जो सतकर्म करती है उससे उनका और पूरे परिवार का कल्याण होता है इसलिए माताओं के पूजन विधान में बहुत सी विधियां बताई गई है। स्थानीय दशहरा मैदान में श्री सिन्हा परिवार द्वारा आनंदराम, गणेश राम व दीपक सिन्हा की स्मृति में आयोजित श्रीमद भागवत महापुराण कथा का बखान करते हुए व्यासपीठ से पंचकोशी धाम फिंगेश्वर वाले भागीरथी जी महराज ने व्यासपीठ से गजेंद्र मोक्ष की कथा का बखान करते हुए कहा कि यह संसार एक कीचड़ है और कीचड़ से बिना दाग लगे जीवन निकालना ही श्रेष्ठ है। जब सरोवर में गजराज और मगर के बीच एक वर्ष तक लड़ाई चली तो अंत में मगर उसे सरोवर के अंदर खींचकर ले गया।

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अंत समय में गजराज ने भगवान का स्मरण कर करूण पुकार लगाई और कमल पुष्प लेकर भगवान का इंतजार करने लगे। भगवान जब भक्त की करूण पुकार सुनकर पहुंचे तो उसे गजराज ने कमल पुष्प भेंट किया। प्रभु ने सूड़ पकड़कर गजराज को सरोवर से बाहर निकाला। गजराज के साथ मगर भी खींचा चला आया। प्रभु ने सुदर्शन से मगर का उद्धार किया। साथ ही गजराज को भी अपना निजधाम में वास दिया।

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व्यासपीठ से महराज जी ने कहा कि त्रिकुट पर्वत पर रहने वाले बलशाली गजराज अपने पूरे परिवार के साथ सुखपूर्वक जीवन व्यतीत कर रहा था लेकिन जब सरोवर में पूरे परिवार के साथ जल क्रीड़ा करने आया तो मगर उसे सरोवर के अंदर ले गया। इस समय परिवार के सभी लोग उसे असहाय छोड़कर चले गए और अंत में प्रभु ने ही उन्हें मोक्ष प्रदान किया। कहने का आशय यह है कि जिस परिवार के लोगों का वह दिन भर लालन-पालन करते रहा वे सभी उसे भूल गए और जीवन में प्रभु का कभी स्मरण नही किया। वही प्रभु अंत समय में दर्शन दिए। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को भगवत स्मरण करते रहना चाहिए। महराज जी ने यह भी बताया कि ऋषि श्राप से गंर्धव को मगर की योनि मिली थी। इसी तरह अगस्त के श्राप से एक राजा को हाथी का योनि प्राप्त हुआ था। भगवान ने दोनों का उद्धार किया।